पहला अध्याय। बहुत पहले नैमिषारण्य वन में शौनक आदि ऋषियों ने कथावाचक सूत जी से पूछा: “इस कठिन कलियुग में क्या कोई सरल व्रत है जो लोगों के दुःख दूर करे?” सूत जी ने बताया कि पृथ्वी पर विचरते हुए नारद मुनि ने लोगों को दुःखी देखा और भगवान विष्णु के पास गए। विष्णु ने उन्हें सत्यनारायण व्रत बताया: किसी भी दिन, विशेषकर शाम को, परिवार और मित्रों के साथ श्रद्धा से सत्यदेव की पूजा करें, केला, घी, दूध और गेहूँ के आटे में शक्कर मिलाकर प्रसाद चढ़ाएँ, यह कथा सुनें, और सबको प्रसाद बाँटें।
दूसरा अध्याय। काशी में एक निर्धन ब्राह्मण रहता था जो रोज़ भिक्षा के लिए भटकता था। विष्णु एक बूढ़े ब्राह्मण के रूप में उसके पास आए और उसे यह व्रत बताया। उसने श्रद्धा से व्रत किया और उसके दुःख दूर हो गए। लकड़ियों का गट्ठर लिए एक लकड़हारे ने ब्राह्मण को पूजा करते देखा, उसके बारे में पूछा, और उस दिन की कमाई से व्रत किया। उसका जीवन भी बदल गया।
तीसरा अध्याय। राजा उल्कामुख और उनकी रानी भद्रशीला नदी के किनारे व्रत कर रहे थे, तभी साधु नाम का एक व्यापारी रुककर पूछने लगा कि वे क्या कर रहे हैं। उसने वचन दिया कि सन्तान होने पर वह भी व्रत करेगा। उसकी पत्नी लीलावती के घर पुत्री कलावती का जन्म हुआ, पर साधु ने वचन टाल दिया, पहले उसके विवाह तक, और फिर भूल गया। बाद में राजा चन्द्रकेतु के राज्य में व्यापार करते समय, एक चोर राजा का चुराया धन उनकी नाव के पास छोड़ गया, और वह तथा उसका दामाद झूठे आरोप में कारागार में डाल दिए गए। घर पर लीलावती और कलावती निर्धन हो गईं। कलावती ने एक पड़ोसी के घर व्रत होते देखा, और लीलावती ने श्रद्धा से व्रत किया। उसी रात प्रभु ने राजा चन्द्रकेतु को स्वप्न में व्यापारियों को छोड़ने को कहा। राजा ने उन्हें मुक्त किया और उनका धन दुगना करके लौटाया।
चौथा अध्याय। घर लौटते समय प्रभु दण्डधारी संन्यासी के रूप में आए और पूछा कि नाव में क्या है। “केवल लता-पत्ते,” व्यापारी ने झूठ कहा, और उसी क्षण नाव में केवल लता-पत्ते रह गए। लज्जित साधु ने क्षमा माँगी, और उसका धन लौट आया। जब नाव घर पहुँची, कलावती व्रत कर रही थी। पति के आने की बात सुनकर वह प्रसाद लिए बिना ही नदी की ओर दौड़ी, और पति सहित नाव आँखों से ओझल होकर डूब गई। आकाशवाणी हुई कि वह लौटकर प्रसाद ग्रहण करे। उसने ऐसा किया, और उसका पति सकुशल जल से बाहर आ गया।
पाँचवाँ अध्याय। शिकार पर निकले राजा तुंगध्वज ने ग्वालों को सत्यनारायण की पूजा करते देखा। अपने पद के अभिमान में उसने न प्रणाम किया, न उनका दिया प्रसाद लिया। जल्दी ही उसके पुत्र और धन चले गए। अपनी भूल समझकर वह ग्वालों के पास लौटा, उनके साथ पूजा की, विनम्रता से प्रसाद लिया, और उसका खोया सब कुछ लौट आया।
कथा के अन्त में कहा गया है कि जो श्रद्धा से यह व्रत करते हैं, वे इस जीवन में शान्ति पाते हैं। यह भी बताया गया है कि वह निर्धन ब्राह्मण आगे सुदामा बना, राजा उल्कामुख दशरथ, व्यापारी राजा मोरध्वज, राजा तुंगध्वज स्वायम्भुव मनु, और लकड़हारा निषादराज गुह, जिसने श्रीराम की सेवा की।
