आरण्यकों में अनुष्ठान, प्रतीक और चिन्तन की सामग्री मिलती है। ब्राह्मण ग्रन्थों और उपनिषदों से उनके सम्बन्ध परम्परा के अनुसार भिन्न हैं।
कुछ अंश बड़े ग्रन्थों के भीतर हैं। इसलिए पुस्तकालय में सम्बन्ध और स्रोत-विवरण चाहिए; हर रूप को पूरी तरह अलग पुस्तक मान लेना पर्याप्त नहीं।
प्रारम्भ में नामित ग्रन्थ और उसका वैदिक सम्बन्ध जानें। यहाँ का मानचित्र इस प्रथम कदम में सहायता करता है; इस परिचय में अभी पूरा अनूदित संग्रह उपलब्ध नहीं है।