समुद्र किनारे राम के सहयोगी मिलकर पुल बना रहे थे। कोई बड़ा पत्थर लाता, कोई उसे रखने का स्थान खोजता। छोटी गिलहरी रेत पर बैठकर देख रही थी।
‘मैं इतना बड़ा पत्थर नहीं उठा सकती,’ उसने सोचा। ‘पर शायद कोई काम मैं भी कर सकूँ।’ उसने थोड़ी रेत इकट्ठी की और काम के पास ले गई। फिर और रेत लेने लौट आई।
एक सहयोगी ने उसकी छोटी-सी मात्रा देखी। ‘यह तो बस थोड़ी रेत है,’ उसने कहा। गिलहरी ने पत्थरों और अपने छोटे पंजों को देखा। एक पल उसे लगा कि शायद वहाँ उसकी जगह ही नहीं है।
राम ने रुककर उसकी बात सुनी। ‘काम के अनेक हिस्से होते हैं,’ उन्होंने स्नेह से कहा। ‘सबकी शक्ति एक जैसी नहीं। लगन और एक-दूसरे की सहायता महत्त्वपूर्ण है।’
सहयोगी ने गिलहरी के लिए जगह बनाई। वह छोटी-छोटी यात्राएँ करती रही और दूसरे पत्थर लाते रहे। उनके काम अलग थे, पर उद्देश्य साझा था।
इस प्रिय भक्तिपरक कथा में गिलहरी परिवारों को याद दिलाती है कि छोटी सहायता भी महत्त्वपूर्ण हो सकती है। हर व्यक्ति आदर का पात्र है, वह भी जिसका योगदान आसानी से दिखाई न दे।
