बहुत पहले अंजना और केसरी के एक नन्हे पुत्र थे। वे वायुदेव के भी पुत्र थे और वन के किसी भी बच्चे से ऊँची छलाँग लगा सकते थे।
एक सुबह वे बहुत भूखे उठे। पूरब में सूरज उग रहा था — गोल और लाल, किसी पके फल जैसा। “नाश्ता!” उन्होंने सोचा, और आसमान की ओर छलाँग लगा दी।
वे बादलों से भी तेज़ ऊपर, और ऊपर उड़ते गए। देवराज इन्द्र ने एक बालक को सूरज की ओर दौड़ते देखा और उसे रोकने के लिए अपना वज्र चलाया। वह नन्हे बालक की ठोड़ी पर लगा, और वे धीरे से धरती पर आ गिरे।
पवनदेव इतने दुःखी हुए कि उन्होंने बहना ही बन्द कर दिया। हर जगह लोगों और पशुओं को साँस लेने में कठिनाई होने लगी।
देवता शीघ्र मनाने पहुँचे। ब्रह्मा जी ने बालक को स्वस्थ किया, और देवताओं ने उसे बल, बुद्धि और रक्षा के वरदान दिए। क्योंकि उसकी हनु, यानी ठोड़ी, पर चोट लगी थी, इसलिए वह हनुमान कहलाया।
वे बड़े होकर बलवान, बुद्धिमान और दयालु बने, और आगे चलकर अपने सारे गुण श्रीराम की सेवा में लगाए। परिवार अक्सर कहते हैं कि सबसे बड़ा बल वही है जो दूसरों की सहायता करे।
