चित्रग्रीव और उसके साथी एक शांत मैदान के ऊपर उड़ रहे थे। नीचे बिखरा हुआ अनाज देखकर भूखे पक्षी एक साथ उतर आए। अचानक छिपे जाल में उनके पैर और पंख उलझ गए।
कुछ कबूतर एक ओर खींच रहे थे, कुछ दूसरी ओर। जाल नहीं हिला। चित्रग्रीव ने सबको रुकने को कहा। ‘जाल को तुरंत मिटा नहीं सकते,’ उसने कहा, ‘पर अपनी गति चुन सकते हैं। मेरे तीन गिनने पर हम सब साथ ऊपर उड़ेंगे।’
तीन पर सभी पक्षियों ने एक ही दिशा में पंख फड़फड़ाए। भारी जाल जमीन से ऊपर उठा। कोई एक पक्षी उसे नहीं उठा सकता था। साथ मिलकर वे अपने मित्र हिरण्यक चूहे के घर की ओर उड़ चले।
हिरण्यक जल्दी बाहर आया। उसने पहले चित्रग्रीव के पास की गाँठ काटनी शुरू की। नेता ने धीरे से कहा, ‘पहले मेरे साथियों को मुक्त करो। उन्होंने यहाँ तक आने के लिए मुझ पर विश्वास किया है।’
चूहा धैर्य से एक-एक गाँठ काटता गया। पक्षी प्रतीक्षा करते हुए एक-दूसरे का साहस बढ़ाते रहे। आखिर सभी मुक्त हो गए। भूल से शुरू हुई यात्रा एकता, मित्रता और सबका ध्यान रखने वाले नेतृत्व के कारण सुखद ढंग से पूरी हुई।
विदा होने से पहले चित्रग्रीव ने हिरण्यक को धन्यवाद दिया। ‘आज हमने सीखा,’ उसने कहा, ‘अनेक पंखों को साझा दिशा चाहिए—और अच्छी योजना के साथ संवेदनशील मित्र भी।’
