एक शेर दिन भर शिकार ढूँढता रहा, पर उसे खाने को कुछ नहीं मिला। सूरज ढलते समय वह एक बड़ी गुफा के पास पहुँचा। “यहाँ कोई जानवर ज़रूर रहता होगा,” उसने सोचा, “मैं अन्दर छिपकर उसके घर लौटने का इन्तज़ार करता हूँ।”
वह गुफा एक सियार की थी। शाम को घर लौटते हुए वह ठिठक गया। नरम मिट्टी में उसे शेर के पंजों के निशान गुफा के अन्दर जाते दिखे, पर बाहर आता एक भी नहीं।
सियार झट से अन्दर नहीं गया। उसने दूर खड़े होकर पुकारा, “गुफा! ओ गुफा!” कोई उत्तर नहीं आया। उसने फिर पुकारा, “गुफा, क्या तुम हमारा वादा भूल गईं? रोज़ शाम को जब मैं घर आता हूँ, तुम मुझे जवाब देती हो। आज जवाब नहीं दोगी, तो मैं किसी दूसरी गुफा में रहने चला जाऊँगा!”
अन्दर बैठे शेर ने सोचा, “तो गुफा रोज़ इसे जवाब देती है। आज चुप रही, तो यह अन्दर आएगा ही नहीं।” और उसने पूरे ज़ोर से दहाड़कर स्वागत किया।
दहाड़ गुफा में ऐसी गूँजी कि पूरी पहाड़ी हिल उठी। “गुफाएँ नहीं बोलतीं,” सियार हँसा, “पर शेर ज़रूर बोलते हैं!” और वह रात के अँधेरे में दूर भाग गया।
सियार इसलिए बचा क्योंकि उसने ध्यान से देखा, एक पल सोचा, और उसके बाद ही तय किया कि क्या करना है।
