रक्तमुख नाम का बंदर नदी किनारे जामुन के पेड़ पर रहता था। एक दिन करालमुख मगरमच्छ नीचे आराम करने आया। बंदर ने उसे पके फल दिए। धीरे-धीरे दोनों हर दोपहर बातें करने लगे।
मगरमच्छ कुछ फल घर ले गया। बाद में उसे बंदर को हानि पहुँचाने के लिए उकसाया गया। वह जानता था कि इससे मित्र का विश्वास टूटेगा, फिर भी उसने बंदर को दूसरे किनारे आने का निमंत्रण दिया। ‘मैं तुम्हें ले चलूँगा,’ उसने कहा।
बंदर उसकी पीठ पर बैठ गया। नदी के बीच पहुँचकर मगरमच्छ ने अपनी हानिकारक योजना बता दी। बंदर डर गया, पर बोलने से पहले ठहरा। उसे सुरक्षित वापस पहुँचने का उपाय सोचना था।
‘यदि तुम ऐसा चाहते हो,’ बंदर ने कहा, ‘तो पहले हमें मेरे पेड़ के पास लौटना होगा।’ उसने ऐसा बहाना बनाया जिससे मगरमच्छ मुड़ गया। किनारे पहुँचते ही बंदर डालियों पर चढ़ गया।
सुरक्षित स्थान से उसने साफ कहा, ‘मैंने मित्रता की। तुमने मुझे चोट पहुँचाने की योजना छिपाई। मैं फिर तुम्हारे साथ नहीं आऊँगा।’ मगरमच्छ ने क्षमा माँगी, पर बंदर अपनी सीमा पर कायम रहा।
बंदर दयालु रह सकता था और संकट को पहचान भी सकता था। उसने सीखा कि विश्वास केवल मीठी बातों से नहीं, ईमानदार व्यवहार से बनता है।
