एक वन में एक हिरन और एक कौआ रहते थे, जो बरसों से मित्र थे। एक दिन एक सियार ने उस हृष्ट-पुष्ट हिरन को देखा और सोचा, “इससे मित्रता कर लूँ, तो किसी दिन बढ़िया भोजन मिल सकता है।” सो वह हिरन से बड़ी मीठी आवाज़ में बोला।
हिरन अपने नए मित्र को घर ले आया। बूढ़े कौए ने भौंहें सिकोड़ीं। “हम इसके बारे में कुछ नहीं जानते,” उसने कहा, “केवल मीठी बातों के कारण किसी पर भरोसा मत करो।” पर सियार ने दुःखी होने का दिखावा किया, और हिरन बोला, “हर कोई कभी न कभी अजनबी ही होता है।”
सियार हिरन को एक किसान के खेत में ले गया, जहाँ कोमल हरी फ़सल लहलहा रही थी। हिरन रोज़ वहाँ मज़े से चरने लगा, यहाँ तक कि एक दिन किसान ने फन्दा लगाया और हिरन उसमें फँस गया।
सियार को आता देख हिरन चिल्लाया, “मित्र, बचाओ!” सियार ने रस्सियाँ देखीं। “अरे, ये तो चमड़े की हैं, और आज मेरा व्रत है। मैं इन्हें दाँतों से नहीं छू सकता।” और वह इस आशा में पास ही छिप गया कि किसान आएगा।
जब हिरन घर नहीं लौटा, तो कौआ उसे ढूँढते-ढूँढते वहाँ पहुँचा। “जल्दी भरोसा करने का यही फल होता है,” उसने आह भरी। “अब सुनो। साँस रोककर ऐसे लेट जाओ मानो तुममें प्राण ही न हों। जब मैं काँव करूँ, उछलकर भाग जाना।”
किसान आया, हिरन को निश्चल पड़ा देखकर फन्दा खोल दिया। “काँव!” कौआ बोला। हिरन उछलकर भाग निकला। किसान ने उसके पीछे अपना डण्डा फेंका, पर वह हिरन को नहीं लगा, झाड़ियों में छिपे सियार को जा लगा, जो चीखता-लँगड़ाता भाग गया। हिरन कौए की सीख कभी नहीं भूला।
