व्रज में ग्वाल-परिवार हर वर्ष की तरह वर्षा देने वाले देवराज इन्द्र की पूजा की तैयारी कर रहे थे।
बालक कृष्ण ने अपने पिता नन्द से पूछा, “हमारी गायें गोवर्धन पर्वत पर चरती हैं। उसकी घास उनका पेट भरती है और उसके झरने हमें जल देते हैं। जो पर्वत और गायें रोज़ हमारा ध्यान रखते हैं, हम उनका सम्मान क्यों न करें?”
सब परिवार सहमत हो गए। उन्होंने बहुत-सा भोजन बनाया, गोवर्धन को भोग लगाया, गायों को खिलाया, सबके साथ भोजन बाँटा और मिलकर पर्वत की परिक्रमा की।
अपनी पूजा भुला दिए जाने से इन्द्र क्रोधित हो गए। उन्होंने काले बादल भेजे और दिन-रात मूसलाधार वर्षा होने लगी। डरे और भीगे हुए लोग अपनी गायों के साथ कृष्ण के पास दौड़े।
कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को एक हाथ से ऐसे उठा लिया, जैसे कोई बालक कुकुरमुत्ता उठा लेता है, और उसे एक बड़े छाते की तरह थाम लिया। लोग और पशु सब उसके नीचे इकट्ठे हो गए, सूखे और सुरक्षित।
सात दिन तक तूफ़ान चलता रहा, और सात दिन तक पर्वत उठा रहा। अन्त में इन्द्र समझ गए कि अहंकार ने उन्हें भटका दिया था। वर्षा थम गई, धूप निकल आई और सब परिवार साथ मिलकर घर लौटे।
