चौदह वर्ष प्रतीक्षा का लम्बा समय होता है। जब श्रीराम वन गए थे, तब जो बच्चे गोद में थे, वे अब इतने बड़े हो गए थे कि आँगन ख़ुद बुहार सकें।
फिर समाचार आया — श्रीराम, सीता और लक्ष्मण घर लौट रहे हैं! पूरा नगर तैयारी में जुट गया। लोगों ने गलियाँ धोईं, द्वारों पर हरे पत्तों के तोरण बाँधे और दरवाज़ों पर रंग-बिरंगे चित्र बनाए।
“वे अमावस्या की रात पहुँचेंगे,” चारु ने अपनी दादी से कहा। “वह तो महीने की सबसे अँधेरी रात होती है। वे रास्ता कैसे देखेंगे?”
दादी ने उसके हाथों में मिट्टी का एक छोटा-सा दीया रख दिया। “एक दीया पूरी सड़क रोशन नहीं कर सकता,” उन्होंने कहा, “पर हर घर एक दीया तो जला सकता है।”
उस शाम देहरियों, दीवारों और छतों पर एक के बाद एक दीये जलते गए, यहाँ तक कि अँधेरी सड़क प्रकाश की नदी-सी चमक उठी, और यात्री उसी के सहारे घर तक पहुँचे।
दीपावली पर दीये जलाते समय अनेक परिवार इसी घर-वापसी का स्मरण करते हैं। हर दीया छोटा होता है; साथ मिलकर वे राह दिखाते हैं।
