॥ श्री गणेशाय नमः ॥English
कथाविधिKathaVidhi

आयु 5–9 · हर छोटा दीप महत्त्वपूर्ण है

अयोध्या के दीप

अयोध्या के दीप

दीपावली की लोक-परम्परा · मौलिक पुनर्कथन

चौदह वर्ष प्रतीक्षा का लम्बा समय होता है। जब श्रीराम वन गए थे, तब जो बच्चे गोद में थे, वे अब इतने बड़े हो गए थे कि आँगन ख़ुद बुहार सकें।

फिर समाचार आया — श्रीराम, सीता और लक्ष्मण घर लौट रहे हैं! पूरा नगर तैयारी में जुट गया। लोगों ने गलियाँ धोईं, द्वारों पर हरे पत्तों के तोरण बाँधे और दरवाज़ों पर रंग-बिरंगे चित्र बनाए।

“वे अमावस्या की रात पहुँचेंगे,” चारु ने अपनी दादी से कहा। “वह तो महीने की सबसे अँधेरी रात होती है। वे रास्ता कैसे देखेंगे?”

दादी ने उसके हाथों में मिट्टी का एक छोटा-सा दीया रख दिया। “एक दीया पूरी सड़क रोशन नहीं कर सकता,” उन्होंने कहा, “पर हर घर एक दीया तो जला सकता है।”

उस शाम देहरियों, दीवारों और छतों पर एक के बाद एक दीये जलते गए, यहाँ तक कि अँधेरी सड़क प्रकाश की नदी-सी चमक उठी, और यात्री उसी के सहारे घर तक पहुँचे।

दीपावली पर दीये जलाते समय अनेक परिवार इसी घर-वापसी का स्मरण करते हैं। हर दीया छोटा होता है; साथ मिलकर वे राह दिखाते हैं।

मिलकर चर्चा करें

आप क्या करेंगे?

  • हर घर ने दीया क्यों जलाया, किसी और के सड़क रोशन करने की प्रतीक्षा क्यों नहीं की?
  • इस दीपावली हमारे परिवार या पड़ोस में किसे थोड़ी-सी रोशनी — सहायता या स्नेह — की ज़रूरत है?

छोटी गतिविधि

दीपावली की रात से पहले

किसी बड़े के साथ परिवार के हर सदस्य के लिए एक-एक मिट्टी का दीया सजाएँ। मिलकर तय करें कि दीपावली की रात कौन-सा दीया कहाँ रखा जाएगा।