नदी-देवी यमुना के भाई यम थे। यम के पास बहुत काम रहता था, और उन्हें अपनी बहन से मिले बहुत समय बीत गया था।
यमुना हर वर्ष उन्हें निमन्त्रण भेजतीं, “मेरे घर भोजन करने आओ।” और हर वर्ष यम उत्तर देते, “अगली बार, पक्का।”
एक वर्ष कार्तिक मास की अमावस्या के बाद की द्वितीया को यम ने अपना काम एक ओर रखा और चल पड़े। उन्हें द्वार पर देखकर यमुना का चेहरा खिल उठा।
उन्होंने भाई के माथे पर तिलक लगाया, उनका प्रिय भोजन बनाया, और दोनों पूरी दोपहर बातें करते और हँसते रहे।
विदा होते समय यम ने पूछा, “मैं तुम्हें क्या उपहार दूँ?” यमुना मुस्कुराईं, “बस इतना — हर वर्ष आना, और इस दिन हर भाई-बहन एक-दूसरे के लिए समय निकालें।”
इसीलिए परिवार कहते हैं कि भाई दूज पर भाई-बहन यम और यमुना को याद करते हैं। तिलक छोटा-सा होता है, पर साथ बिताया समय ही असली उपहार है।
